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३४० श्री परमात्मने नमः अथ श्रीमद्भगवद्गीता ११ यथार्थ गीता १ अथ प्रथमोडध्यायः / धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जया१११ | धृतराष्ट्र ने पूछा- "हे संजय! धर्मक्षेत्र, में एकत्र युद्ध को इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? ' अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र और संयमरूपी संजय...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता शरीर की आवश्यक खुराक मात्र है| तीनों गुण मनुष्य को से कीटपर्यन्त शरीरों में ही बाँधते हैं॰ जब तक प्रकृति और प्रकृति से उत्पन्न गुण जीवित हैं तब तक कुरु' लगा रहेगा| अतः जन्म-्मृत्युवाला क्षेत्र, विकारोंवाला क्षेत्र है और परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्यमयी प्रवृत्तियों ( पाण्डवों...
प्रथम अध्याय उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा- द्वैत का आचरण ही द्रोणाचार्य है| जब जानकारी हो जाती है कि हम परमात्मा से अलग हो गये हैं ( यही द्वैत का भान है) , वहाँ उसको प्राप्ति के लिये तड़प पैदा हो जाती है, तभी हम गुरु को तलाश में निकलते हैं॰ दोनों प्र...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता इस सेना में महेष्वासाः महान् ईश में वास दिलानेवाले , भावरूपी भीम' , अनुरागरूपी अर्जुन' के समान बहुत से शूरवीर , जैसे- सात्त्विकतारूपीं सात्यकि विराटः सर्वत्र ईश्वरीय प्रवाह की धारणा , महारथी राजा द्रुपद अर्थात् अचल स्थिति तथा- धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान्' पुरुजित्कुन्तिभोजश्च...
प्रथम अध्याय द्विजोत्तम ! हमारे पक्ष में जो-जो प्रधान हैं, उन्हें भी आप समझ लें| आपको जानने के लिये मेरी सेना के जो-जो नायक हैं, उनको कहता हूँ| बाह्य युद्ध में सेनापति के लिये द्विजोत्तम' सम्बोधन असामयिक है| वस्तुतः गीता' में अन्तःकरण को दो प्रवृत्तियों का संघर्ष है| जिसमें द्वैत का आचरण ही द्रोण है| जब तक हम लेशमात्...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता छोरत ग्रन्थि जानि खगराया बिघ्न अनेक करड तब माया| | सिद्धि प्रेरइ बहु भाई| बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई॰| ( रामचरितमानस , ७/११७/६-७ ) माया अनेक विघ्न करतीं है, ऋद्धियाँ प्रदान करतीं है, यहाँ तक कि सिद्ध बना देती है॰ ऐसीं अवस्थावाला साधक बगल से निकल भर जाय मरणासन्न रोगी भी जी उठेगा| वह भले ठीक हो...
प्रथम अध्याय जायेंगी? भगवान के चिन्तन के स्थान पर विभूतियों का चिन्तन होने लगता है[ साधक की दृष्टि केवल कर्म पर होनी चाहिये , उसे फल कोी वासनावाला नहों होना चाहिये; किन्तु जब वह ऋद्धियों सिद्धियों का चिन्तन करने लगता है यह विकल्प ही विकर्ण है॰ये कल्पनाएँ विशिष्ट हैं, साधना में भयंकर बाधक हैं॰ भ्रममयी श्वास ही भूरिश्रवा...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता है कि भीष्म कौन-्सी सत्ता है, जिस पर कौरव निर्भर करते हैं तथा भीम कौन-सी सत्ता है, जिस पर ( दैवीं सम्पद् ) सम्पूर्ण पाण्डव निर्भर हैं| दुर्योधन अपनी व्यवस्था देता है कि- अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि१११११| इसलिये सब मोर्चों पर अपनी- अपनी जगह स्थित आप...
प्रथम अध्याय आत्मकामो तस्टा प्राणा उत्रामन्ति बहौव सन् बह्माप्येति ' बृहदारण्यक उप॰ ४/४/६ )-जो कामनाओं से रहित आत्मा में स्थिर आत्मस्वरूप है , उसका कभी पतन नहों होता| वह ब्रह्म के साथ एक हो जाता है॰] आरम्भ में इच्छाएँ अनन्त होती हैं और अन्ततोगत्वा परमात्म- प्राप्ति की इच्छा शेष रहती है| जब यह इच्छा भी पूरी हो जाती है,...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता योगदर्शन, १/१४ )- दीर्घकाल तक निरन्तर श्रद्धा- भक्तिपूर्वक हुआ साधन ही दृढ़ हो पाता है| तस्य सञ्चनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः| सिंहनादं विनद्योच्चै : शङ्खं प्रतापवान्११२१ | इस प्रकार अपने बलाबल का निर्णय लेकर शंखध्वनि हुई| शंखध्वनि पात्रों के पराक्रम को घोषणा है कि जीतने पर कौन ्सा पात्र ...
प्रथम अध्याय ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ| माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः१११४१ | इसके उपरान्त श्वेत घोड़ों ( जिनमें लेशमात्र कालिमा , दोष नहों है- श्वेत सात्त्विक , निर्मलता का प्रतीक है) ' महति स्यन्दने ' महान् रथ पर बैठे हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाये| अलौकिक का अर्थ...
२२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता होती है आत्मा से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है॰ इससे परे स्थिर आत्मिक सम्पत्ति ही निज सम्पत्ति है| बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को यहीं समझाया कि धन से सम्पन्न के स्वामित्व से भी अमृतत्व की प्राप्ति नहों हो सकती| उसका उपाय आत्मिक सम्पत्ति है| भयानक कर्मवाले भीमसेन ने अर्थात् ...
प्रथम अध्याय १३ वास्तविक सत्संग है| यह सत्संग चिन्तन, ध्यान और समाधि के अभ्यास से सम्पत्रन होता है| ज्यों -ज्यों सत्य के सान्निध्य में सुरत टिकतीं जायेगी , त्यों -त्यों एक-एक श्वास पर नियंत्रण मिलता जायेगा , मनसहित इन्द्रियों का निरोध होता जायेगा| जिस दिन सर्वथा निरोध होगा , वस्तु प्राप्त हो जायेगी| वाद्ययन्त्रों की तर...
१४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता धृष्टद्युम्नः दृढ़ और अचल मन तथा ' विराटः सर्वत्र विराट् ईश्वर का प्रसार देखने को क्षमता इत्यादि दैवी सम्पद् के प्रमुख गुण हैं| सात्त्विकता ही सात्यकि है| सत्य के चिन्तन कोी प्रवृत्ति अर्थात् सात्त्विकता यदि बनी है तो कभी गिरावट नहों आने पायेगी| इस संघर्ष में पराजित नहों होने देगी| द्रौप...
प्रथम अध्याय अजुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय १२११ | संयमरूपी संजय ने अज्ञान से आवृत्त मन को समझाया कि हे राजन्! इसके उपरान्त ' कपिध्वजः वैराग्यरूपी हनुमान , वैराग्य ही ध्वज है जिसका ( ध्वज राष्ट्र का प्रतीक माना जाता है| कुछ लोग कहते हैं- ध्वजा चंचल थी, इसलिये कपिध्वज कहा गया| किन्तु नहों , यहाँ कपि साधारण बन्दर...
१६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्| उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनितित २५| | संजय बोला - निद्राजयी अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृदय के ज्ञाता श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच भोष्म, द्रोण और ' महीक्षिताम् - शरीरूूपी पर अधिकार जमाये हुए सम्पूर्ण राजाओं के बीच उत्तम रथ को...
प्रथम अध्याय १७ इस प्रकार खड़े हुए उन सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर अत्यन्त करुणा से आवृत्त वह कुन्तीपुत्र अर्जुन शोक करता हुआ बोला| अर्जुन शोक करने लगा; क्योंकि उसने देखा कि यह सब तो अपना परिवार हीं है, अतः बोला- अर्जुन उवाच दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्| २८| | सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति| शरीरे ...
२८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि चढ त इमेउवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि चा१३३१| हमें जिनके लिये राज्य , भोग और सुखादिक इच्छित हैं, वे ही परिवार जीवन की आशा त्यागकर युद्ध के मैदान में खड़े हैं| हमें राज्य इच्छित था तो परिवार को लेकरः भोग , सुख और धन को पिपासा थो तो स्...
प्रथम अध्याय रहें, सभी सुखी रहें और इन सबकी व्यवस्था करते हुए वह परमात्म - स्वरूप की प्राप्ति भी कर लेे| किन्तु जब वह समझता है कि आराधना में अग्रसर होने के लिये परिवार छोड़ना होगा , इन सम्बन्धों का मोह समाप्त करना होगा तो वह अधोर हो उठता है॰ पूज्य महाराज जी' कहा करते थे- ' मरना और साधु होना बराबर है| साधु के लिये सृष्टि...
२ ० श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता आत्मा के पथ में अवरोध उत्पन्न करता है| आत्मदर्शन में बाधक काम , क्रोध , लोभ , मोह आदि का समूह ही आततायो है| तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव| १३७१ | इससे हे माधव ! अपने बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिये हम योग्य नहों ...
प्रथम अध्याय प्रणश्यन्ति सनातनाः धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोउभिभवत्युता १४०१| कुल के नाश होने से सनातन नष्ट हो जाते हैं| अर्जुन कुलधर्म , कुलाचार को ही सनातन- धर्म समझ रहा था| धर्म के नाश होने पर सम्पूर्ण कुल को पाप दबा लेता है| अधर्माभिभवात्कृष्ण स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करःा ४११| हे कृष्ण पाप के अध...
२२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता उत्सन्रकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन| नरकेडनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम| १४४ | हे जनार्दन ! नष्ट हुए कुलधर्मवाले मनुष्यों का अनन्तकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हमने सुना है| केवल ही नहों नष्ट होता, बल्कि शाश्वत - सनातन धर्म भी नष्ट हो जाता है| जब धर्म हीं नष्ट हो गया, तब ऐसे पुरुष का ...
प्रथम अध्याय २३ इतना प्रबल होता है| इसोलिये अर्जुन कहता है कि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र मुझ न प्रतिकार करनेवाले को रण में मार दें, तब भी वह मेरे लिये अतिकल्याणकारी होगा ताकि लड़के तो सुखी रहें| सञ्जचय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्| सशरं चापं शोकसंविग्रनमानसः १४७| | संजय बोला कि रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन...
२४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता रूढ़ियों में अपना बचाव लगता है, जैसा अर्जुन ने किया| उसने कहा- ही सनातन- धर्म है| इस युद्ध से सनातन- धर्म नष्ट हो जायेगा , कुल की स्त्रियाँ दूषित होंगी , वर्णसंकर पैदा होगा , और कुलघातियों को अनन्तकाल तक नरक में ले जाने के लिये ही होता है॰ अर्जुन अपनी समझ से सनातन- धर्म को रक्षा के लिये व...
३ँँ श्री परमात्मने नमः /| १ अथ द्वितीयोडध्यायः / प्रथम अध्याय गीता की प्रवेशिका है, जिसमें आरम्भ में पथिक को प्रतीत होनेवाली उलझनों का चित्रण है| लड़नेवाले सम्पूर्ण कौरव और पाण्डव संशय का पात्र मात्र अर्जुन है| अनुराग ही अर्जुन है| इष्ट के अनुरूप राग ही पथिक को क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के संघर्ष के लिये प्रेरित करता है| अनुरा...
२६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता नहीं ! दोष हमारे भ्रमदाताओं का है| धर्म के नाम पर हम के शिकार हैं इसलिये दोष हमारा है| महात्मा समय में केश- कम्बल एक सम्प्रदाय था , जिसमें केश को बढ़ाकर कम्बल की तरह प्रयोग करने को पूर्णता का मानदण्ड माना जाता था| कोई गोव्रतिक ( गाय की भाँति रहनेवाला ) था, तो कोई कुक्कुरव्रतिक (कुत्ते को ...
द्वितीय अध्याय २७ यह ही देनेवाला है और न यह कोीर्ति को हीं करनेवाला है पर जो दृढ़तापूर्वक आरूढ़ है , उसे आर्य कहते हैं| गीता आर्यसंहिता है| परिवार के लिये मरना-मिटना यदि अज्ञान न होता तो महापुरुष उस पर अवश्य चले होते| यदि कुलधर्म ही सत्य होता तो स्वर्ग और कल्याण की निःश्रेणी अवश्य बनतीं| यह कोर्तिदायक भी नहीं है| मीरा भज...
२८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता त्याग करो| यह हृदय को दुर्बलता मात्र है| इस पर अर्जुन ने तीसरा प्रश्न प्रस्तुत किया - अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन| इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन| १४१ | अहंकार का शमन करनेवाले मधुसूदन ! मैं रणभूमि में पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण से किस प्रकार बाणों करूँगा?...
द्वितीय अध्याय इन महानुभाव को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी श्रेयस्कर समझता हूँ॰ यहाँ भिक्षा का अर्थ उदर- पोषण के लिये भीख माँगना नहों बल्कि कोी टूटी-्फूटी सेवा द्वारा उनसे कल्याण को याचना ही है| अन्नं बह्येति व्यजानात् ' ( तैत्तिरीय उप॰ , भृगुबल्ली २ ) अन्न एकमात्र परमात्मा है, जिसे प्राप्त करके आत्मा सदा ...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सामने खड़े हैं| जब अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र से उत्पन्न मोह इत्यादि स्वजन- समुदाय मिट ही जायेंगे , तब हम जी कर ही क्या करेंगे? अर्जुन पुनः सोचता है कि जो कुछ हमने कहा, कदाचित् यह भो अज्ञान हो; अतः प्रार्थना करता है- कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं...
द्वितीय अध्याय २ < को सुखानेवाले शोक को दूर कर सके| जब शोक बना हो है तो यह सब लेकर ही मैं क्या करूँगा? यदि इतना ही मिलना है तो क्षमा करें| अर्जुन ने सोचा , अब इसके आगे बतायेंगे भो क्याः सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकशः परन्तप| न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा = बभूव हढ़१९१ | संजय बोला - हे राजन् ! मोहनिशाजयो अर्जुन न...
३२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता न तो ऐसा ही है कि मैं अर्थात् सद्गुरु किसी काल में नहों था अथवा तू अनुरागी अधिकारी अथवा जनाधिपाः राजा लोग अर्थात् राजसी वृत्ति में पाया जानेवाला अहं नहों था और न ऐसा हीं है कि आगे हम सब नहों रहेंगे| सद्गुरु सदैव रहता है, सदैव रहते हैं| यहाँ योगेश्वर ने योग की अनादिता पर प्रकाश डालते हुए ...
द्वितीय अध्याय ३३ दुःख- सुख, मान- अपमान को सहन करना एक योगी पर निर्भर करता है| यह हृदय- देश को लड़ाई का चित्रण है बाहर युद्ध के लिये गीता नहों कहती| यह क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ का संघर्ष है , जिसमें आसुरी सम्पद् का सर्वथा शमन कर परमात्मा में स्थिति दिलाकर दैवीं सम्पद् भी शान्त हो जाती है| जब विकार हैं ही नहीं तो सजातीय प्रव...
३४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता नाशरहित तो वह है , जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है॰ इस अव्ययस्य अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहों है| किन्तु इस अविनाशी , अमृत का नाम क्या है? वह है कौन? - अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः अनाशिनोउप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत१११८ | अविनाशी , अप्रमेय , नित्यस्वरूप आत्मा...
द्वितीय अध्याय २५ सर्वथा निरोध होना , अचल स्थिर ठहरना और अन्तिम संस्कार का विलय एक ही क्रिया है| संस्कारों को सतह का टूट जाना ही शरीरों का अन्त है| इसे तोड़ने के लिये आपको आराधना करनी होगी, जिसे श्रीकृष्ण ने कर्म या निष्काम कर्मयोग को संज्ञा दी है॰ श्रीकृष्ण ने स्थान-स्थान पर अर्जुन की प्रेरणा दी; किन्तु एक भी श्लोक ऐसा...
३६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता देश- विदेश में , मानवमात्र में आत्मा एक ही जैसा है| इसलिये विश्व में कहों भी कोई आत्मा की स्थिति दिलानेवाली क्रिया जानता है और उस पर चलने के लिये प्रयत्नशील है तो वह सनातनधर्मी है, चाहे वह अपने को ईसाई , मुसलमान , यहूदी या कुछ भी क्यों न कह ले| वेदाविनाशिनं नित्यं या एनमजमव्ययम्| कथं स प...
द्वितीय अध्याय २७ पर होता है| अपने संकल्प से बनाये हुए शरीरों में पुरुष उत्पन्न होता है| इस प्रकार मृत्यु शरीर का परिवर्तन मात्र है| आत्मा नहों मरताा पुनः अजरता अमरता पर बल देते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः २३१| अर्जुन ! इस आत्मा को शस्त्रादि नहों काटते, अग्नि इसे...
३८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता बढ़ा , देश का विभाजन हुआ और राष्ट्रीय एकता कोी आज भी समस्या बनी हुई है| इन कुरीतियों के कथानक इतिहास में भरे पडे़े हैं॰ हमीरपुर जिले में पचास साठ परिवार क्षत्रिय थे| आज वे सब मुसलमान हैं॰ न उन पर तोप का हमला हुआ , न तलवार काढ हुआ क्या? अर्द्धरात्रि में दो-एक मौलवीं उस गाँव के एकमात्र कुए...
द्वितीय अध्याय शूद्रों , वैश्यों , क्षत्रियों और ब्राह्मणों को, सबको वेद पढ़़ने का अधिकार था| प्रत्येक वर्ग के ऋषियों ने वैदिक मन्त्रों की रचना को है, शास्त्रार्थ निर्णय में भाग लिया है| प्राचीन राजाओं ने धर्म के नाम पर आडम्बर फैलानेवालों को दण्ड दिया, धर्मपरायणों का समादर किया था| मध्यकालीन भारत में सनातन- धर्म की यथार...
४० श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता ऐसी ही कतिपय कुरीतियाँ अर्जुनकाल में भी थों| उनका शिकार अर्जुन भी था| उसने विलाप करते हुए गिड़गिड़ाकर कहा कि सनातन है| युद्ध से सनातन-्धर्म नष्ट हो जायेगा| नष्ट होने से हम अनन्तकाल तक नरक में चले जायेंगे| श्रोकृष्ण ने कहा- " तुझे यह अज्ञान कहाँ से उत्पत्न हो गया२ ' सिद्ध है कि वह कोई कुरीत...
द्वितीय अध्याय ४२ तू शोक करने योग्य नहीं है| अब श्रीकृष्ण अर्जुन के विचारों में विरोधाभास दिखाते हैं , जो सामान्य तर्क है- अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्| तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि| १२६१| यदि तू इसे सदैव जन्मनेवाला और सदा मरनेवाला माने तब भी तुझे शोक नहों करना चाहिये; क्योंकि- जातस्य हि धरुवो मृत्य...
४२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता कोई महापुरुष ही आश्चर्य की तरह इसके तत्त्व को कहता है| जिसने देखा है, वहीं यथार्थ कह सकता है| दूसरा कोई विरला साधक इसे आश्चर्य को भाँति सुनता है| सब भी नहों; क्योंकि यह अधिकारीं के लिये ही है| हे अर्जुन ! कोई - कोई तो सुनकर भी इस आत्मा को नहों जान पाते; क्योंकि साधन पार नहों लगता| आप लाख...
द्वितीय अध्याय ४२ इसी एक सनातन आत्मिक पथ पर चलनेवाले साधकों को महापुरुष ने स्वभाव को क्षमता के अनुसार चार श्रेणियों में बाँटा- शूद्र , वैश्य , क्षत्रिय और ब्राह्मण| साधना को प्रारम्भिक अवस्था में प्रत्येक साधक शूद्र अर्थात् अल्पज्ञ होता है| घण्टों भजन में बैठने पर वह दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाता वह प्रकृति के माय...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता को जानकर इस लोक से मरकर जाता है वह ब्राह्मण है| ( बृहदारण्यकोपनिषद् , तृतीय अध्याय , अष्टम ब्राह्मण ) अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है॰ श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्षत्रिय श्रेणी के साधक के लिये युद्ध के अतिरिक्त कोई कल्याणकारी रास्ता है ही नहों| प्रश्न उठता है कि क्षत्रिय है क्याः प्रायः लोग इ...
द्वितीय अध्याय यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्| / ३२१ | पार्थिव शरीर को ही रथ बनाकर अचूक लक्ष्यवेधी अर्जुन स्वतः प्राप्त स्वर्ग के खुले हुए द्वाररूपी इस युद्ध को भाग्यवान् क्षत्रिय हो प्राप्त करते हैं| क्षत्रिय श्रेणी के साधक में तीनों गुणों को काट देने की क्षमता रहती ह...
४६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सब लोग बहुत काल तक तेरीं अपकोर्ति का कथन करेंगे| आज भी पदच्युत होनेवाले महात्माओं में विश्वामित्र , पराशर , शृङ्गीं इत्यादि की गणना होती है| बहुत से साधक अपने धर्म पर विचार करते हैं , सोचते हैं कि लोग हमें क्या कहेंगे? ऐसा भाव भी साधना में सहायक होता है| इससे साधना में लगे रहने की प्रेरण...
द्वितीय अध्याय ४७ प्रायः लोग इस श्लोक के अर्थ में समझते हैं कि इस युद्ध में मरोगे तो स्वर्ग जाओगे और जीतोगे तो पृथ्वी का भोग भोगोगे; आपको स्मरण होगा, अर्जुन कह चुका है- ' भगवन्! हीं नहों अपितु त्रैलोक्य के साम्राज्य और देवताओं के स्वामीपन अर्थात् इन्द्रपद प्राप्त होने पर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता, जो इन्द्रियों को स...
४८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता एषा तेउभिहिता साङ्ख्ये बुद्धि्योंगे त्विमां शृणु| बुद्द्ध्या यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि| |३९| | पार्थ ! यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानयोग के विषय में कही गयो है| कौन-सी बुद्धि? यही कि युद्ध करा ज्ञानयोग में इतना ही है कि अपनी हस्ती को देखकर , लाभ- हानि का भली प्रकार विचार करके कि जोतेंगे ...
द्वितीय अध्याय देता है| धर्म परिवर्तित नहों होता| आप इस कर्म को समझें और इस पर दो कदम चल भर दें (जो सद्गृहस्थ आश्रम ही चला जा सकता है, साधक तो चलते ही हैं॰) , बोज भर डाल दें, तो अर्जुन! बीज का नाश नहों होता| में कोई क्षमता नहों , ऐसा कोई अस्त्र नहों कि उस सत्य को मिटा दे| प्रकृति केवल आवरण डाल सकती है, कुछ देर कर सकती ...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्| क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति| १४३| | पार्थ ! वे कामात्मानः कामनाओं से युक्त , वेदवादरताः - वेद के वाक्यों में अनुरक्त ,' स्वर्गपराः - स्वर्ग को ही परम लक्ष्य मानते हैं कि इससे आगे कुछ है ही नहों- ऐसा कहनेवाले अविवेकोजन जन्म- मृत्युरूपी फल दे...
द्वितीय अध्याय आदितत्त्व में प्रवेश दिलानेवाली निश्चयात्मक क्रिया संयुक्त नहीं होती| प्रश्न उठता है कि वेदवादरताः जो वेद के वचनों में अनुरक्त हैं, क्या वे भी भूल करते हैं? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं- त्रैगुण्यविषया निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन| निर्द्वद्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् १४५१ | अर्जुन ! ' त्रैगुण्यवि...
५२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता उनका उपयोग है| वहीं से चर्चा आरम्भ होगी| इसके उपरान्त योगेश्वर श्रीकृष्ण कर्म करते समय बरती जानेवाली सावधानियों का प्रतिपादन करते हैं कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन| मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गो उस्त्वकर्मणित १४७१ | कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फल में कभी नहों| ऐसा समझ कि फल है...
द्वितीय अध्याय ५३ उनकी वाणी की छाप जिनके चित्त पर पड़ जाती है, उनको भी बुद्धि नष्ट हो जाती है अतः निश्चयात्मक क्रिया एक ही हैः लेकिन यह नहीं बताया कि वह क्रिया कौन-सीं है? सैंतालीसवें श्लोक में उन्होंने कहा- अर्जुन! कर्म करने में ही तेरा अधिकार है फल में कभी नहों| फल की वासनावाला भी मत हो और कर्म करने में तेरी अश्रद्धा...
५४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता रखते हुए कर्म का आचरण करना चाहिये| समत्व भाव अर्थात् सिद्धि और असिद्धि में समभाव ही योग कहलाता है| जिसको सिद्धि और असिद्धि विचलित नहों कर पातों , विषमता जिसमें पैदा नहीं होती , ऐसा भाव होने के कारण यह समत्व योग कहलाता है| यह इष्ट से समत्व दिलाता है, इसलिये इसे समत्व योग कहते हैं| कामनाओं...
द्वितीय अध्याय ८ 4 भी कहा जाता है| इसलिये धनंजय तू समत्व बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण कर; क्योंकि फल की वासनावाले अत्यन्त कृपण हैं| बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते| तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॰१५०१ | समत्व बुद्धियुक्त पुरुष पुण्य- पाप दोनों को ही इसो लोक में त्याग देता है , उनसे लिपायमान नहीं होता| इसलिय...
५६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता जन्म- मृत्यु से मुक्ति, निर्मल अविनाशी पद को प्राप्ति| बस ये दो हो योगक्रिया हैं॰ इसके अतिरिक्त बुद्धि अविवेकजन्य है , अनन्त शाखाओंवाली है, जिसका फल कर्मभोग के लिये बारम्बार जन्म- मृत्यु है| अर्जुन को दृष्टि त्रिलोको के साम्राज्य तथा देवताओं के स्वामीपन तक ही सोमित थो| इतने तक के लिये भो...
द्वितीय अध्याय यह विचलित बुद्धि जिस समय समाधि में स्थिर हो जायेगी , की पराकाष्ठा अमृत पद को प्राप्त करेगा| इस पर अर्जुन को उत्कण्ठा स्वाभाविक है कि वे महापुरुष कैसे होते हैं जो अनामय परमपद में स्थित हैं समाधि में जिनकी बुद्धि स्थिर है? उसने प्रश्न किया- अ्जुन उवाच स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव| स्थितधी : किं ...
५८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्| नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता| १५७१| सर्वत्र स्नेहरहित हुआ शुभ अथवा अशुभ को प्राप्त होकर न तो प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है , उसको बुद्धि स्थिर है| शुभ वह है जो परमात्मस्वरूप में लगाता है, अशुभ वह है जो प्रकृति की ओर ले ...
द्वितीय अध्याय ५९ महापुरुष कछुए की तरह अपनी इन्द्रियों को विषयों में नहीं फैलाता| एक बार जब इन्द्रियाँ सिमट गयीं तो संस्कार ही मिट जाते हैं, पुनः वे नहीं निकलते| निष्काम कर्मयोग के आचरण द्वारा परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन के साथ उस पुरुष का विषयों से राग भी निवृत्त हो जाता है| प्रायः चिन्तन- पथ में हठ करते हैं| हठ से इन...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः| १६०१| कौन्तेय प्रयत्न करनेवाले मेधावी पुरुष की प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मन को बलात् हर लेतीं हैं, विचलित कर देती हैं| इसलिये- तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः| वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठित...
द्वितीय अध्याय परायण बुद्धि नष्ट हो जाती है और बुद्धिनाश होने से यह पुरुष अपने श्रेय- साधन से च्युत हो जाता है| यहाँ श्रीकृष्ण ने बल दिया है कि विषयों का चिन्तन नहीं करना चाहिये| साधक को रूप , लीला और धाम में ही कहों लगे रहना चाहिये भजन में ढोल देने पर मन विषयों में जायेगा| विषयों के चिन्तन से आसक्ति हो जाती है| आसक्ति...
६२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता भगवान के पूर्ण कृपा- प्रसाद भगवत्ता से संयुक्त होने पर उसके सम्पूर्ण का अभाव हा जाता है , दुःखालयम् अशाश्वतम् ' १( गीता , ८/१५ ) संसार का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्तवाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही अच्छो प्रकार स्थिर हो जाती है| किन्तु जो योगयुक्त नहों है, उसको दशा पर प्रकाश डालते है...
द्वितीय अध्याय ६३ अग्रसर है वह भी महाबाहु है| श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों को महाबाहु कहा गया है| या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी| यस्यां जाग्रति सा निशा पश्यतो मुनेः| १६९१ | सम्पूर्ण भूतप्राणियों के लिये वह परमात्मा रात्रि है; क्योंकि दिखायी नहीं देता, न विचार ही काम करता है इसलिये रात्रि सदृश है| उस रात्रि में ...
६४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता समुद्र में गिरते हैं किन्तु समुद्र को न एक इंच ऊपर उठा पाते हैं और न गिरा हीं पाते हैं, बल्कि उसी में समाहित हो जाते हैं| ठीक इसी प्रकार स्थितप्रज्ञ महापुरुष के प्रति सम्पूर्ण भोग उतने ही वेग से आते हैं , किन्तु समाहित हो जाते हैं॰ उन महापुरुषों में न शुभ संस्कार डाल पाते हैं, न अशुभ| यो...
द्वितीय अध्याय निष्कर्ष- प्रायः कुछ लोग = कहते हैं कि दूसरे अध्याय में गीता पूर्ण हो गयी; यदि केवल कर्म का नाम मात्र लेने से कर्म पूरा हो जाता हो, तब तो गीता का समापन माना जा सकता है॰ इस अध्याय में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने यही बताया कि- अर्जुन निष्काम कर्मयोग के विषय जिसे जानकर तू संसार- बन्धन से छूट जायेगा| कर्म करने में...
६६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता है॰ ज्ञानयोगी अपनी शक्ति सामने रखकर , अपने हानि-्लाभ का विचार कर अपने भरोसे चलता है, जबकि दोनों के शत्रु एक ही हैं| ज्ञानमार्गी को काम, क्रोधादि पर विजय पाना है और निष्काम कर्मयोगी को भो इन्हों से युद्ध करना है| कामनाओं का त्याग दोनों करते हैं और दोनों मार्गों में किया जानेवाला कर्म भो ए...
३ँँ० श्री परमात्मने नमः /| ४ अथ तृतीयोडध्यायः /१ अध्याय दो में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि यह बुद्धि तेरे लिये ज्ञानमार्ग विषय में कहीं गयी| कौन-सी बुद्धि? यहीं कि युद्ध कर| जीतोगे तो महामहिम की स्थिति प्राप्त कर लोगे और हारोगे तो देवत्व है| जीत में सर्वस्व है और हार में भी देवत्व है , कुछ मिलता ही है| अतः इस दृष्टि से...
६८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता जनों पर दया करनेवाले जनार्दन! यदि निष्काम कर्मयोग को अपेक्षा ज्ञानयोग आपको श्रेष्ठ मान्य है, तो हे केशव ! आप मुझे भयंकर कर्मयोग में क्यों लगाते हैं? निष्काम कर्मयोग में अर्जुन को भयंकरता दिखायी पड़ी; क्योंकि इसमें कर्म करने में ही अधिकार है फल में कभी नहों| कर्म करने में अश्रद्धा भी न हो ...
अध्याय ६९ अर्जुन ! मनुष्य न तो कर्मों को न आरम्भ करने से निष्कर्मता को अन्तिम स्थिति को प्राप्त होता है और न आरम्भ को हुई क्रिया को त्यागने मात्र भगवत्प्राप्तिरूपी परमसिद्धि को ही प्राप्त होता है| अब तुझे ज्ञानमार्ग अच्छा या निष्काम कर्ममार्ग , दोनों में कर्म तो करना ही पड़ेगा| प्रायः इस स्थल पर लोग भगवत्पथ में संक्षिप्...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्| इन्द्रियार्थान्त्रिमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते| १६१| इतने पर भी विशेष रूप से जो कर्मेन्द्रियों को हठ से रोककर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण करते रहते हैं वे मिथ्याचारी हैं , पाखण्डी हैं न कि ज्ञानो| सिद्ध है कि कृष्णकाल में भी ऐसी रूढ़ियाँ थी...
ततीय अध्याय शरीरों को ही तो यात्रा कर रहा है| कर्म कोई ऐसीं वस्तु है जो इस यात्रा को सिद्ध कर देती है, पूर्ण कर देती है| मान लें , एक ही जन्म लेना पडा तो यात्रा जारी है, अभी तो पथिक चल हो रहा है| वह दूसरे शरीरों को यात्रा कर रहा है| यात्रा पूर्ण तब होती है जब गन्तव्य आ जाय| परमात्मा में स्थिति के अनन्तर इस आत्मा को शरी...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता लगे| योगेश्वर श्रीकृष्ण की शैली से स्पष्ट है कि जिस वस्तु का चित्रण करना है,वे पहले उसको विशेषताओं का चित्रण करते हैं जिससे श्रद्धा जागृत हो, तत्पश्चात् वे उसमें बरती जानेवाली सावधानियों पर प्रकाश डालते हैं और अन्त सिद्धान्त प्रतिपादित करते हैं| स्मरण रहे कि यहाँ पर श्रीकृष्ण ने कर्म के दूस...
अध्याय ७२ बन्धनकारी कर्म है, न कि मोक्षद कर्म2 वस्तुतः यज्ञ को प्रक्रिया ही कर्म है| अब यज्ञ न बताकर पहले यह बताते हैं कि यज्ञ आया कहाँ से? - सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः| अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोउस्त्विष्टकामधुक्| ११०१ | प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञसहित प्रजा को रचकर कहा कि इस यज्ञ द्वारा वृद्...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता पहले से ही हैं; अस्त-्व्यस्त एवं विकृत हैं| यज्ञ के अनुरूप उन्हें ढालना ही रचना या सजाना है॰ ऐसे महापुरुष ने कल्प के आदि में यज्ञसहित प्रजा की रचना को| कल्प नोरोग बनाता है| वैद्य कल्प देते हैं, कोई कायाकल्प कराता है| यह क्षणिक शरीरों का कल्प है| वास्तविक कल्प तो तब है, जब भवरोग से मुक्ति मि...
अध्याय इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो स्तेन एव सः१११२१| यज्ञ द्वारा संवर्धित देवता ( दैवी सम्पद्) आपको इष्टान् भोगान् हि दास्यन्ते इष्ट अर्थात् आराध्य - सम्बन्धी भोगों को देंगे , अन्य कुछ नहों| ' तैः दत्तान् - वे ही एकमात्र देनेवाले हैं| इष्ट को पाने का अन्य कोई विकल्प नहों है| इ...
७६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता नष्ट तो नहों होगा; आगे नहों बढ़ेगा| इसलिये श्रीकृष्ण निष्काम भाव से कर्म ( भजन ) करने पर बल देते हैं॰ अभी तक श्रीकृष्ण ने बताया कि यज्ञ परमश्रेय देता है और उसकी रचना महापुरुष द्वारा होती है| किन्तु वे महापुरुष प्रजा को रचना में क्यों प्रवृत्त होते हैं? इस पर कहते हैं- अन्नाद्भवन्ति भूतानि...
अध्याय ए्वं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः | अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति| ११६म| हे पार्थ! जो पुरुष इसी लोक में मनुष्य-शरीर प्राप्त कर इस प्रकार चलाये हुए साधन-चक्र के अनुसार नहों बरतता अर्थात् दैवीं सम्पद् का उत्कर्ष, देवताओं की वृद्धि और परस्पर वृद्धि के द्वारा अक्षयधाम को प्राप्त करना - इस क्रम के अनुसार...
७८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सनातन , अविनाशी आत्मतत्त्व प्राप्त हो गया तो आगे ढूँढ़े किसे? के लिये न कर्म को आवश्यकता है, न किसी आराधना को| आत्मा और परमात्मा एक के पर्याय हैं| इसी का पुनः चित्रण करते हैं नैव तस्य कृतेनार्थों नाकृतेनेह कश्चन| न चाप्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः ११८१| इस संसार में उस पुरुष का कर्म ...
अध्याय जनक इत्यादि ज्ञानीजन महापुरुष भो ' कर्मणा एव हि संसिद्धिम् ' कर्मों के द्वारा ही परमसिद्धि को प्राप्त हुए हैं| परमसिद्धि माने परमतत्त्व परमात्मा को प्राप्ति| जनक इत्यादि जितने भी पूर्व में होनेवाले महर्षि हुए हैं, इस ' कार्यं कर्म' के द्वारा, जो यज्ञ को प्रक्रिया है, इस कर्म को करके ही ' संसिद्धिम् परमसिद्धि को...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः१ १२३१| क्योंकि यदि मैं सावधान होकर कदाचित् कर्म में न बरतूँ तो मनुष्य मेरे बर्ताव के अनुसार बरतने लग जायेंगे| तो क्या आपका अनुकरण भी बुरा है? कहते हैं - हाँ ! उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म सङ्करस्य च कर...
अध्याय ८२ श्रीकृष्ण कहते हैं- यदि मैं सावधान होकर आराधना में लगा न रहूँ तो वर्णसंकर का होऊँ| वस्तुतः आत्मा का शुद्ध वर्ण है परमात्मा| अपने शाश्वत स्वरूप के पथ से भटक जाना वर्णसंकरता है| यदि स्वरूपस्थ महापुरुष क्रिया में नहीं बरतते तो लोग उनके अनुकरण से क्रियारहित हो जायेंगे , आत्मपथ से भटक जायेंगे , वर्णसंकर हो जायेंगे...
८२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा भारत कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्रचिकीर्षुलोकसङ्ग्रहम्| | २५ | हे भारत कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही अनासक्त हुआ पूर्णज्ञाता भी लोक-्हृदय में प्रेरणा और कल्याण- संग्रह चाहता हुआ कर्म करे| यज्ञ को विधि जानते और करते हुए भी हम अज्ञानी ह...
तृतीय अध्याय ८३ यही कारण है कि अनुयायियों से कराने के लिये वह महापुरुष भली प्रकार कर्म में बरतता है॰ ' जिस गुन को सिखावै , उसे करके दिखावै| इस प्रकार स्वरूपस्थ महापुरुष को भी चाहिये कि स्वयं कर्म करता हुआ साधकों को भी आराधना में लगाये रहे| साधक भी श्रद्धापूर्वक आराधना में लगें| किन्तु चाहे ज्ञानयोगी हो अथवा समर्पण भाव...
८४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता होगी| गुण परिवर्तनशील हैं प्रत्यक्षदर्शी ज्ञानी ही देख पाता है कि गुणों के अनुरूप कर्मों का उत्कर्ष-्अपकर्ष होता है॰| गुण अपना कार्य करा लेते हैं, अर्थात् गुण गुणों में बरतते हैं - ऐसा समझकर वह प्रत्यक्ष द्रष्टा कर्म में आसक्त नहों होता| किन्तु जिन्होंने गुणों का पार नहों पाया , जो अभी र...
अध्याय ८५ ममतारहित और सन्तापरहित होकर युद्ध करढ जब चित्त ध्यान में स्थित है भी कहीं आशा नहों , कर्म में ममत्व नहीं है, असफलता का सन्ताप नहीं है तो वह पुरुष कौन-सा युद्ध करेगा? जब सब ओर से चित्त सिमटकर हृदय-् देश में निरुद्ध होता जा रहा है तो वह लड़ेगा किसलिये , किससे और वहाँ है कौन? वास्तव में जब आप ध्यान में प्रवेश करे...
८६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्| सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः १३२१| जो दोषदृष्टिवाले ' अचेतसः - मोहनिशा में अचेत लोग मेरे इस मत के अनुसार नहों बरतते अर्थात् ध्यानस्थ होकर आशा, ममता और सन्तापरहित होकर समर्पण के साथ युद्ध नहों करते, ' सर्वज्ञानविमूढान् - ज्ञान-पथ में ...
अध्याय ८७ पाना , सजातीय प्रवृत्ति को साधकर विजातीय का अन्त करना विजातीय समाप्त होने पर सजातीय का उपयोग समाप्त हो जाता है| स्वरूप का स्पर्श करके सजातीय का भी उसके अन्तराल में विलय हो जाना , इस प्रकार प्रकृति का पार पाना युद्ध है, जो ध्यान में ही सम्भव है| राग और द्वेष के शमन में समय लगता है, इसलिये बहुत से साधक क्रिया क...
८८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता आदेश हुआ था कि भक्तों के कल्याणार्थ कुछ ताड़ना दिया करें , इस पथ के पथिकों पर निगरानी रखें| महाराज जी को नकल कर वे महात्मा भी गालियाँ देने लगें; किन्तु बदले में लोग भी कुछ-्न-्कुछ कह बैठते थे| वे महात्मा कहने लगे-्वहाँ कोई बोलता नहों, यहाँ तो जवाब देते हैं| दो-एक साल बाद लौटे तो देखा कि...
अध्याय को| तो क्या जन्म के आधार पर को बाँटाः नहों ,' गुणकर्म विभागशः गुणों के आधार पर कर्म बाँटा गया| कौन-सा कर्म? क्या सांसारिक कर्म? श्रीकृष्ण कहते हैं- नहों, नियत कर्म| नियत कर्म क्या है? वह है यज्ञ को प्रक्रिया , जिसमें होता है श्वास में प्रश्वास का हवन, प्रश्वास में श्वास का हवन , इन्द्रिय-्संयम इत्यादि, जिसका शुद...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता धूमेनात्रियते बह्निर्यथादर्शों मलेन चढ यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्| १३८१ जैसे धुएँ से अग्नि और मल से दर्पण ढँक जाता है, जैसे जेर से गर्भ ढँका हुआ है , ठीक वैसे ही काम- क्रोधादि विकारों से यह ज्ञान ढँका हुआ है| भोंगी लकड़ीं जलाने पर धुआँ-हो- धुआँ होता है| अग्नि रहकर भी लपट का रूप नह...
अध्याय इनके अन्तराल में छिपा है॰ वह शरीर के भोतर है॰ बाहर खोजने से वह कहों नहों मिलेगा| यह हृदय- देश की , अन्तर्जगत् कोी लड़ाई है| इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान का नाश करनेवाले इस पापी काम को ही मारढ काम सीधे पकड में नहोीं आयेगा अतः विकारों के निवास स्थान का ही घेराव कर लो, इन्द्रियों को ही संयत कर लो| किन...
९२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता इस अध्याय में उन्होंने कर्म को परिभाषित किया कि यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है| सिद्ध है कि यज्ञ कोई निर्धारित दिशा है| अतिरिक्त भी किया जाता है वह इसी लोक का बन्धन है| श्रीकृष्ण जिसे कहेंगे , वह कर्म ' मोक्ष्यसे उशुभात् - संसार - बन्धन से छुटकारा दिलानेवाला कर्म है| श्रीकृष्ण की उत्पत्ति ...
अध्याय ९३ कर्मयोग कैसे है? कर्म का स्वरूप भी स्पष्ट नहों है , जिसे किया जायः क्योंकि यज्ञ की प्रक्रिया ही कर्म है - अभी तक उन्होंने इतना हीं बताया| यज्ञ तो बताया नहीं, कर्म का स्वरूप स्पष्ट कहाँ हुआ? हाँ, युद्ध का यथार्थ चित्रण गीता में यहीं पाया जाता है| सम्पूर्ण गीता पर दृष्टिपात करें तो अध्याय दो में कहा कि शरीर नाश...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतारूपी उपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र विषयक श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद में शत्रुविनाश- प्रेरणा' नामक तीसरा अध्याय पूर्ण होता है| इति श्रीमत्परमहंसपरमानन्दस्य शिष्य स्वामीअड़गड़ानन्दकृते श्रीमद्भवगद्गीतायाः ' यथार्थगीता ' भाष्ये ' शत्रुविनाशप्रेरणा ' नाम तृती...
३४० श्री परमात्मने नमः | ४! अथ चतुर्थोडध्यायः |१ अध्याय तीन में योगेश्वर श्रीकृष्ण ने आश्वस्त किया कि दोषदृष्टि से रहित होकर जो भी मानव श्रद्धायुक्त हो मेरे मत के अनुसार चलेगा , वह कर्मों के बन्धन से भली प्रकार छूट जायेगा| कर्मबन्धन से मुक्ति दिलाने की क्षमता योग ( ज्ञानयोग तथा कर्मयोग , दोनों ) में है| योग में ही युद...
९६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता भजन का कोई संस्कार नहों है, योग के विषय में जिसने कभी सोचा तक नहों , ऐसा मनुष्य किसी महापुरुष को देखता है तो उनके दर्शनमात्र से, उनकी वाणी से, टूटी-फूटी सेवा और सान्निध्य से योग के संस्कार उसमें संचारित हो जाते हैं| गोस्वामी तुलसीदास जी इसी को कहते हैं- जे प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे| ते सब भ...
अध्याय स एवायं मया तेउद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तो उसि मे सख्ा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॰१३१| वह ही यह पुरातन योग अब मैंने तेरे लिये वर्णन किया है; क्योंकि तू मेरा भक्त और सखा है और यह योग उत्तम अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक था , राजर्षि की अवस्थावाला था , जहाँ ऋद्धियों - सिद्धियों के थपेड़े में साधक नष्ट हो जाता है...
९८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता अभो तक योगेश्वर श्रीकृष्ण ने किसी महापुरुष द्वारा योग का आरम्भ , उसमें आनेवाले व्यवधान और उनसे पार पाने का रास्ता बताया| इस पर अर्जुन ने प्रश्न किया - अर्जुन उवाच अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानितित१४१| भगवन् आपका जन्म तो अपरम - अब हुआ है और मेरे अन्द...
अध्याय मैं विनाशरहित , पुनः जन्मरहित और समस्त प्राणियों के स्वर में संचारित होने पर भी अपनी प्रकृति को अधीन करके आत्ममाया से प्रकट होता हूँ॰ एक माया तो अविद्या है जो प्रकृति में ही विश्वास दिलाती है, नीच एवं अधम योनियों का कारण बनती है| माया है आत्ममाया , जो आत्मा में प्रवेश दिलातीं है स्वरूप के जन्म का कारण बनती है| इ...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता यह अवतार किसी भाग्यवान साधक के अन्तराल में होता है| आप प्रकट होकर करते क्या हैं?- परित्राणाय विनाशाय च दुष्कृताम्| धर्मसंस्थापनार्थाया सम्भवामि युगे युगे|१८|| अर्जुन ! ' साधूनां परित्राणाय परमसाध्य एकमात्र परमात्मा है , जिसे साध लेने पर कुछ भी साधना शेष नहों रह जाता| उस साध्य में प्रवेश दिल...