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३४० श्री परमात्मने नमः अथ श्रीमद्भगवद्गीता ११ यथार्थ गीता १ अथ प्रथमोडध्यायः / धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जया१११ | धृतराष्ट्र ने पूछा- "हे संजय! धर्मक्षेत्र, में एकत्र युद्ध को इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? ' अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र और संयमरूपी संजय...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता शरीर की आवश्यक खुराक मात्र है| तीनों गुण मनुष्य को से कीटपर्यन्त शरीरों में ही बाँधते हैं॰ जब तक प्रकृति और प्रकृति से उत्पन्न गुण जीवित हैं तब तक कुरु' लगा रहेगा| अतः जन्म-्मृत्युवाला क्षेत्र, विकारोंवाला क्षेत्र है और परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्यमयी प्रवृत्तियों ( पाण्डवों...
प्रथम अध्याय उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा- द्वैत का आचरण ही द्रोणाचार्य है| जब जानकारी हो जाती है कि हम परमात्मा से अलग हो गये हैं ( यही द्वैत का भान है) , वहाँ उसको प्राप्ति के लिये तड़प पैदा हो जाती है, तभी हम गुरु को तलाश में निकलते हैं॰ दोनों प्र...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता इस सेना में महेष्वासाः महान् ईश में वास दिलानेवाले , भावरूपी भीम' , अनुरागरूपी अर्जुन' के समान बहुत से शूरवीर , जैसे- सात्त्विकतारूपीं सात्यकि विराटः सर्वत्र ईश्वरीय प्रवाह की धारणा , महारथी राजा द्रुपद अर्थात् अचल स्थिति तथा- धृष्टकेतुश्चेकितान: काशिराजश्च वीर्यवान्' पुरुजित्कुन्तिभोजश्च...
प्रथम अध्याय द्विजोत्तम ! हमारे पक्ष में जो-जो प्रधान हैं, उन्हें भी आप समझ लें| आपको जानने के लिये मेरी सेना के जो-जो नायक हैं, उनको कहता हूँ| बाह्य युद्ध में सेनापति के लिये द्विजोत्तम' सम्बोधन असामयिक है| वस्तुतः गीता' में अन्तःकरण को दो प्रवृत्तियों का संघर्ष है| जिसमें द्वैत का आचरण ही द्रोण है| जब तक हम लेशमात्...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता छोरत ग्रन्थि जानि खगराया बिघ्न अनेक करड तब माया| | सिद्धि प्रेरइ बहु भाई| बुद्धिहि लोभ दिखावहिं आई॰| ( रामचरितमानस , ७/११७/६-७ ) माया अनेक विघ्न करतीं है, ऋद्धियाँ प्रदान करतीं है, यहाँ तक कि सिद्ध बना देती है॰ ऐसीं अवस्थावाला साधक बगल से निकल भर जाय मरणासन्न रोगी भी जी उठेगा| वह भले ठीक हो...
प्रथम अध्याय जायेंगी? भगवान के चिन्तन के स्थान पर विभूतियों का चिन्तन होने लगता है[ साधक की दृष्टि केवल कर्म पर होनी चाहिये , उसे फल कोी वासनावाला नहों होना चाहिये; किन्तु जब वह ऋद्धियों सिद्धियों का चिन्तन करने लगता है यह विकल्प ही विकर्ण है॰ये कल्पनाएँ विशिष्ट हैं, साधना में भयंकर बाधक हैं॰ भ्रममयी श्वास ही भूरिश्रवा...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता है कि भीष्म कौन-्सी सत्ता है, जिस पर कौरव निर्भर करते हैं तथा भीम कौन-सी सत्ता है, जिस पर ( दैवीं सम्पद् ) सम्पूर्ण पाण्डव निर्भर हैं| दुर्योधन अपनी व्यवस्था देता है कि- अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि१११११| इसलिये सब मोर्चों पर अपनी- अपनी जगह स्थित आप...
प्रथम अध्याय आत्मकामो तस्टा प्राणा उत्रामन्ति बहौव सन् बह्माप्येति ' बृहदारण्यक उप॰ ४/४/६ )-जो कामनाओं से रहित आत्मा में स्थिर आत्मस्वरूप है , उसका कभी पतन नहों होता| वह ब्रह्म के साथ एक हो जाता है॰] आरम्भ में इच्छाएँ अनन्त होती हैं और अन्ततोगत्वा परमात्म- प्राप्ति की इच्छा शेष रहती है| जब यह इच्छा भी पूरी हो जाती है,...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता योगदर्शन, १/१४ )- दीर्घकाल तक निरन्तर श्रद्धा- भक्तिपूर्वक हुआ साधन ही दृढ़ हो पाता है| तस्य सञ्चनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः| सिंहनादं विनद्योच्चै : शङ्खं प्रतापवान्११२१ | इस प्रकार अपने बलाबल का निर्णय लेकर शंखध्वनि हुई| शंखध्वनि पात्रों के पराक्रम को घोषणा है कि जीतने पर कौन ्सा पात्र ...
प्रथम अध्याय ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ| माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः१११४१ | इसके उपरान्त श्वेत घोड़ों ( जिनमें लेशमात्र कालिमा , दोष नहों है- श्वेत सात्त्विक , निर्मलता का प्रतीक है) ' महति स्यन्दने ' महान् रथ पर बैठे हुए योगेश्वर श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाये| अलौकिक का अर्थ...
२२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता होती है आत्मा से इसका कोई सम्बन्ध नहीं है॰ इससे परे स्थिर आत्मिक सम्पत्ति ही निज सम्पत्ति है| बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को यहीं समझाया कि धन से सम्पन्न के स्वामित्व से भी अमृतत्व की प्राप्ति नहों हो सकती| उसका उपाय आत्मिक सम्पत्ति है| भयानक कर्मवाले भीमसेन ने अर्थात् ...
प्रथम अध्याय १३ वास्तविक सत्संग है| यह सत्संग चिन्तन, ध्यान और समाधि के अभ्यास से सम्पत्रन होता है| ज्यों -ज्यों सत्य के सान्निध्य में सुरत टिकतीं जायेगी , त्यों -त्यों एक-एक श्वास पर नियंत्रण मिलता जायेगा , मनसहित इन्द्रियों का निरोध होता जायेगा| जिस दिन सर्वथा निरोध होगा , वस्तु प्राप्त हो जायेगी| वाद्ययन्त्रों की तर...
१४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता धृष्टद्युम्नः दृढ़ और अचल मन तथा ' विराटः सर्वत्र विराट् ईश्वर का प्रसार देखने को क्षमता इत्यादि दैवी सम्पद् के प्रमुख गुण हैं| सात्त्विकता ही सात्यकि है| सत्य के चिन्तन कोी प्रवृत्ति अर्थात् सात्त्विकता यदि बनी है तो कभी गिरावट नहों आने पायेगी| इस संघर्ष में पराजित नहों होने देगी| द्रौप...
प्रथम अध्याय अजुन उवाच सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय १२११ | संयमरूपी संजय ने अज्ञान से आवृत्त मन को समझाया कि हे राजन्! इसके उपरान्त ' कपिध्वजः वैराग्यरूपी हनुमान , वैराग्य ही ध्वज है जिसका ( ध्वज राष्ट्र का प्रतीक माना जाता है| कुछ लोग कहते हैं- ध्वजा चंचल थी, इसलिये कपिध्वज कहा गया| किन्तु नहों , यहाँ कपि साधारण बन्दर...
१६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्| उवाच पार्थ पश्यैतान्समवेतान्कुरूनितित २५| | संजय बोला - निद्राजयी अर्जुन द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर हृदय के ज्ञाता श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच भोष्म, द्रोण और ' महीक्षिताम् - शरीरूूपी पर अधिकार जमाये हुए सम्पूर्ण राजाओं के बीच उत्तम रथ को...
प्रथम अध्याय १७ इस प्रकार खड़े हुए उन सम्पूर्ण बन्धुओं को देखकर अत्यन्त करुणा से आवृत्त वह कुन्तीपुत्र अर्जुन शोक करता हुआ बोला| अर्जुन शोक करने लगा; क्योंकि उसने देखा कि यह सब तो अपना परिवार हीं है, अतः बोला- अर्जुन उवाच दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्| २८| | सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति| शरीरे ...
२८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि चढ त इमेउवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि चा१३३१| हमें जिनके लिये राज्य , भोग और सुखादिक इच्छित हैं, वे ही परिवार जीवन की आशा त्यागकर युद्ध के मैदान में खड़े हैं| हमें राज्य इच्छित था तो परिवार को लेकरः भोग , सुख और धन को पिपासा थो तो स्...
प्रथम अध्याय रहें, सभी सुखी रहें और इन सबकी व्यवस्था करते हुए वह परमात्म - स्वरूप की प्राप्ति भी कर लेे| किन्तु जब वह समझता है कि आराधना में अग्रसर होने के लिये परिवार छोड़ना होगा , इन सम्बन्धों का मोह समाप्त करना होगा तो वह अधोर हो उठता है॰ पूज्य महाराज जी' कहा करते थे- ' मरना और साधु होना बराबर है| साधु के लिये सृष्टि...
२ ० श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता आत्मा के पथ में अवरोध उत्पन्न करता है| आत्मदर्शन में बाधक काम , क्रोध , लोभ , मोह आदि का समूह ही आततायो है| तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान् स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव| १३७१ | इससे हे माधव ! अपने बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिये हम योग्य नहों ...
प्रथम अध्याय प्रणश्यन्ति सनातनाः धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोउभिभवत्युता १४०१| कुल के नाश होने से सनातन नष्ट हो जाते हैं| अर्जुन कुलधर्म , कुलाचार को ही सनातन- धर्म समझ रहा था| धर्म के नाश होने पर सम्पूर्ण कुल को पाप दबा लेता है| अधर्माभिभवात्कृष्ण स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करःा ४११| हे कृष्ण पाप के अध...
२२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता उत्सन्रकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन| नरकेडनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम| १४४ | हे जनार्दन ! नष्ट हुए कुलधर्मवाले मनुष्यों का अनन्तकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हमने सुना है| केवल ही नहों नष्ट होता, बल्कि शाश्वत - सनातन धर्म भी नष्ट हो जाता है| जब धर्म हीं नष्ट हो गया, तब ऐसे पुरुष का ...
प्रथम अध्याय २३ इतना प्रबल होता है| इसोलिये अर्जुन कहता है कि शस्त्रधारी धृतराष्ट्र मुझ न प्रतिकार करनेवाले को रण में मार दें, तब भी वह मेरे लिये अतिकल्याणकारी होगा ताकि लड़के तो सुखी रहें| सञ्जचय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्| सशरं चापं शोकसंविग्रनमानसः १४७| | संजय बोला कि रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन...
२४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता रूढ़ियों में अपना बचाव लगता है, जैसा अर्जुन ने किया| उसने कहा- ही सनातन- धर्म है| इस युद्ध से सनातन- धर्म नष्ट हो जायेगा , कुल की स्त्रियाँ दूषित होंगी , वर्णसंकर पैदा होगा , और कुलघातियों को अनन्तकाल तक नरक में ले जाने के लिये ही होता है॰ अर्जुन अपनी समझ से सनातन- धर्म को रक्षा के लिये व...
३ँँ श्री परमात्मने नमः /| १ अथ द्वितीयोडध्यायः / प्रथम अध्याय गीता की प्रवेशिका है, जिसमें आरम्भ में पथिक को प्रतीत होनेवाली उलझनों का चित्रण है| लड़नेवाले सम्पूर्ण कौरव और पाण्डव संशय का पात्र मात्र अर्जुन है| अनुराग ही अर्जुन है| इष्ट के अनुरूप राग ही पथिक को क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के संघर्ष के लिये प्रेरित करता है| अनुरा...
२६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता नहीं ! दोष हमारे भ्रमदाताओं का है| धर्म के नाम पर हम के शिकार हैं इसलिये दोष हमारा है| महात्मा समय में केश- कम्बल एक सम्प्रदाय था , जिसमें केश को बढ़ाकर कम्बल की तरह प्रयोग करने को पूर्णता का मानदण्ड माना जाता था| कोई गोव्रतिक ( गाय की भाँति रहनेवाला ) था, तो कोई कुक्कुरव्रतिक (कुत्ते को ...
द्वितीय अध्याय २७ यह ही देनेवाला है और न यह कोीर्ति को हीं करनेवाला है पर जो दृढ़तापूर्वक आरूढ़ है , उसे आर्य कहते हैं| गीता आर्यसंहिता है| परिवार के लिये मरना-मिटना यदि अज्ञान न होता तो महापुरुष उस पर अवश्य चले होते| यदि कुलधर्म ही सत्य होता तो स्वर्ग और कल्याण की निःश्रेणी अवश्य बनतीं| यह कोर्तिदायक भी नहीं है| मीरा भज...
२८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता त्याग करो| यह हृदय को दुर्बलता मात्र है| इस पर अर्जुन ने तीसरा प्रश्न प्रस्तुत किया - अर्जुन उवाच कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन| इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन| १४१ | अहंकार का शमन करनेवाले मधुसूदन ! मैं रणभूमि में पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण से किस प्रकार बाणों करूँगा?...
द्वितीय अध्याय इन महानुभाव को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न भी श्रेयस्कर समझता हूँ॰ यहाँ भिक्षा का अर्थ उदर- पोषण के लिये भीख माँगना नहों बल्कि कोी टूटी-्फूटी सेवा द्वारा उनसे कल्याण को याचना ही है| अन्नं बह्येति व्यजानात् ' ( तैत्तिरीय उप॰ , भृगुबल्ली २ ) अन्न एकमात्र परमात्मा है, जिसे प्राप्त करके आत्मा सदा ...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता सामने खड़े हैं| जब अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र से उत्पन्न मोह इत्यादि स्वजन- समुदाय मिट ही जायेंगे , तब हम जी कर ही क्या करेंगे? अर्जुन पुनः सोचता है कि जो कुछ हमने कहा, कदाचित् यह भो अज्ञान हो; अतः प्रार्थना करता है- कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं...
द्वितीय अध्याय २ < को सुखानेवाले शोक को दूर कर सके| जब शोक बना हो है तो यह सब लेकर ही मैं क्या करूँगा? यदि इतना ही मिलना है तो क्षमा करें| अर्जुन ने सोचा , अब इसके आगे बतायेंगे भो क्याः सञ्जय उवाच एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकशः परन्तप| न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा = बभूव हढ़१९१ | संजय बोला - हे राजन् ! मोहनिशाजयो अर्जुन न...
३२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता न तो ऐसा ही है कि मैं अर्थात् सद्गुरु किसी काल में नहों था अथवा तू अनुरागी अधिकारी अथवा जनाधिपाः राजा लोग अर्थात् राजसी वृत्ति में पाया जानेवाला अहं नहों था और न ऐसा हीं है कि आगे हम सब नहों रहेंगे| सद्गुरु सदैव रहता है, सदैव रहते हैं| यहाँ योगेश्वर ने योग की अनादिता पर प्रकाश डालते हुए ...
द्वितीय अध्याय ३३ दुःख- सुख, मान- अपमान को सहन करना एक योगी पर निर्भर करता है| यह हृदय- देश को लड़ाई का चित्रण है बाहर युद्ध के लिये गीता नहों कहती| यह क्षेत्र- क्षेत्रज्ञ का संघर्ष है , जिसमें आसुरी सम्पद् का सर्वथा शमन कर परमात्मा में स्थिति दिलाकर दैवीं सम्पद् भी शान्त हो जाती है| जब विकार हैं ही नहीं तो सजातीय प्रव...
३४ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता नाशरहित तो वह है , जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है॰ इस अव्ययस्य अविनाशी का विनाश करने में कोई समर्थ नहों है| किन्तु इस अविनाशी , अमृत का नाम क्या है? वह है कौन? - अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः अनाशिनोउप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत१११८ | अविनाशी , अप्रमेय , नित्यस्वरूप आत्मा...
द्वितीय अध्याय २५ सर्वथा निरोध होना , अचल स्थिर ठहरना और अन्तिम संस्कार का विलय एक ही क्रिया है| संस्कारों को सतह का टूट जाना ही शरीरों का अन्त है| इसे तोड़ने के लिये आपको आराधना करनी होगी, जिसे श्रीकृष्ण ने कर्म या निष्काम कर्मयोग को संज्ञा दी है॰ श्रीकृष्ण ने स्थान-स्थान पर अर्जुन की प्रेरणा दी; किन्तु एक भी श्लोक ऐसा...
३६ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता देश- विदेश में , मानवमात्र में आत्मा एक ही जैसा है| इसलिये विश्व में कहों भी कोई आत्मा की स्थिति दिलानेवाली क्रिया जानता है और उस पर चलने के लिये प्रयत्नशील है तो वह सनातनधर्मी है, चाहे वह अपने को ईसाई , मुसलमान , यहूदी या कुछ भी क्यों न कह ले| वेदाविनाशिनं नित्यं या एनमजमव्ययम्| कथं स प...
द्वितीय अध्याय २७ पर होता है| अपने संकल्प से बनाये हुए शरीरों में पुरुष उत्पन्न होता है| इस प्रकार मृत्यु शरीर का परिवर्तन मात्र है| आत्मा नहों मरताा पुनः अजरता अमरता पर बल देते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः २३१| अर्जुन ! इस आत्मा को शस्त्रादि नहों काटते, अग्नि इसे...
३८ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता बढ़ा , देश का विभाजन हुआ और राष्ट्रीय एकता कोी आज भी समस्या बनी हुई है| इन कुरीतियों के कथानक इतिहास में भरे पडे़े हैं॰ हमीरपुर जिले में पचास साठ परिवार क्षत्रिय थे| आज वे सब मुसलमान हैं॰ न उन पर तोप का हमला हुआ , न तलवार काढ हुआ क्या? अर्द्धरात्रि में दो-एक मौलवीं उस गाँव के एकमात्र कुए...
द्वितीय अध्याय शूद्रों , वैश्यों , क्षत्रियों और ब्राह्मणों को, सबको वेद पढ़़ने का अधिकार था| प्रत्येक वर्ग के ऋषियों ने वैदिक मन्त्रों की रचना को है, शास्त्रार्थ निर्णय में भाग लिया है| प्राचीन राजाओं ने धर्म के नाम पर आडम्बर फैलानेवालों को दण्ड दिया, धर्मपरायणों का समादर किया था| मध्यकालीन भारत में सनातन- धर्म की यथार...
४० श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता ऐसी ही कतिपय कुरीतियाँ अर्जुनकाल में भी थों| उनका शिकार अर्जुन भी था| उसने विलाप करते हुए गिड़गिड़ाकर कहा कि सनातन है| युद्ध से सनातन-्धर्म नष्ट हो जायेगा| नष्ट होने से हम अनन्तकाल तक नरक में चले जायेंगे| श्रोकृष्ण ने कहा- " तुझे यह अज्ञान कहाँ से उत्पत्न हो गया२ ' सिद्ध है कि वह कोई कुरीत...
द्वितीय अध्याय ४२ तू शोक करने योग्य नहीं है| अब श्रीकृष्ण अर्जुन के विचारों में विरोधाभास दिखाते हैं , जो सामान्य तर्क है- अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्| तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि| १२६१| यदि तू इसे सदैव जन्मनेवाला और सदा मरनेवाला माने तब भी तुझे शोक नहों करना चाहिये; क्योंकि- जातस्य हि धरुवो मृत्य...
४२ श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता कोई महापुरुष ही आश्चर्य की तरह इसके तत्त्व को कहता है| जिसने देखा है, वहीं यथार्थ कह सकता है| दूसरा कोई विरला साधक इसे आश्चर्य को भाँति सुनता है| सब भी नहों; क्योंकि यह अधिकारीं के लिये ही है| हे अर्जुन ! कोई - कोई तो सुनकर भी इस आत्मा को नहों जान पाते; क्योंकि साधन पार नहों लगता| आप लाख...
द्वितीय अध्याय ४२ इसी एक सनातन आत्मिक पथ पर चलनेवाले साधकों को महापुरुष ने स्वभाव को क्षमता के अनुसार चार श्रेणियों में बाँटा- शूद्र , वैश्य , क्षत्रिय और ब्राह्मण| साधना को प्रारम्भिक अवस्था में प्रत्येक साधक शूद्र अर्थात् अल्पज्ञ होता है| घण्टों भजन में बैठने पर वह दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाता वह प्रकृति के माय...
श्रीमद्भगवद्गीता यथार्थ गीता को जानकर इस लोक से मरकर जाता है वह ब्राह्मण है| ( बृहदारण्यकोपनिषद् , तृतीय अध्याय , अष्टम ब्राह्मण ) अर्जुन क्षत्रिय श्रेणी का साधक है॰ श्रीकृष्ण कहते हैं कि क्षत्रिय श्रेणी के साधक के लिये युद्ध के अतिरिक्त कोई कल्याणकारी रास्ता है ही नहों| प्रश्न उठता है कि क्षत्रिय है क्याः प्रायः लोग इ...
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